जिस ने रोका था वफ़ा से वो वफ़ादार गया
ख़ुद ही उस राह से मजबूर वो लाचार गया
मेरे हर ख़्वाब का क़ातिल वही ठहरा आख़िर
जिस को दुनिया से बचाने में मैं हर बार गया
ख़ुद को रोका था बहुत तेरी मुहब्बत से मगर
दिल न माना यूँ हुआ फिर कि मैं दिल हार गया
चाँदनी रात थी फिर झूम के जुल्फ़ें बिखरीं
तेरी आँखों में था जादू जो मुझे मार गया
जिस की आँखों में बसी थी मिरी पूरी दुनिया
वो नज़र फेरे सर-ए-राह गुनहगार गया
अब तो ग़म भी मिरे सीने से जुदा लगता है
जो कभी मरहम-ए-ग़म था वही ग़म-ख़्वार गया
— Arman Habib















