किसी के इश्क़ में ख़ुद को कहीं वो खो रही होगी
लिपट कर वो किसी सीने से शायद सो रही होगी
मेरी आवाज़ उस को शहद सी कानों में घुलती थी
किसी आवाज़ पर फिर से फ़िदा वो हो रही होगी
मैं उस की याद में ग़ज़लें लिखा करता हूँ रातों में
वो क्या पढ़ कर ग़ज़ल मेरी कहीं वो रो रही होगी
जलाकर दिल मिरा जो राख से काजल लगाई थी
गिरा कर अश्क उस की आँख काजल धो रही होगी
— Arman Habib















