"मोल"
पिता के महल की राज-कुमारी थी
मेरा क्या मोल, मैं तो अनजानी थी
बाज़ार की वो सारी गुड़ियाँ मेरी थी
बेच दी गई यहाँ, ये मेरी कहानी थी
बेख़ौफ़ उड़ने की मुझे आज़ादी थी
बंधन न समझी, ये मेरी नादानी थी
आसमाँ में पंछी देख यादें आती थी
अब रसोई घर तक मेरी कहानी थी
करती याद दादी की कहानियाँ थी
राजा को ये रानी, न भाई हैरानी थी
पिता के महल की मैं राज-कुमारी थी
मैं अनमोल नहीं ये बात मैं ने मानी थी
— Arpit Sharma















