दुखा के दिल जिन्हें शर्मिंदगी नहीं होती
उन्हें कभी कोई हासिल ख़ुशी नहीं होती
मैं जानता हूँ इन्हें फूल हैं ये काग़ज़ के
बदन में इनके कोई ताज़गी नहीं होती
ये किस गुनाह की इनको सज़ा मिली या-रब
चराग़ जलते हैं और रौशनी नहीं होती
उड़ानी पड़ती है मजनू को ख़ाक सहरा में
जुनूँ बग़ैर कभी आशिक़ी नहीं होती
कोई जलाता रहे लाख शमा-ए-उल्फ़त अब
हमारे दिल में मगर रौशनी नहीं होती
हर एक दर पे फिरे मांँगते हुए क़तरे
वो तिश्नगी भी कोई तिश्नगी नहीं होती
हमारे साथ तेरा ग़म न होता, मर जाते
कोई भी रात अकेले कटी नहीं होती
कोई भी मुझको न पहचानता यहाँ साहिल
जो बेवफ़ाई तुम्हारी मिली नहीं होती
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