हुस्न को रब ने क्या कशिश दी है
जिसने हर आँख को ख़लिश दी है
ज़ख़्म-ए-उल्फ़त कहाँ छुपाऊंँ मैं
दर्द ने दिल में फिर दबिश दी है
वो ही झलकेगी उनके लहजे से
जैसी बच्चों को परवरिश दी है
सब पे उंगली उठा रहे हैं आप
क्या कभी ख़ुद को सरज़निश दी है
मैंने मिसरों को ख़ून दे देकर
शोख़ ग़ज़लों को भी तपिश दी है
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