हसरतों को कुचल गया है ''इश्क़
हद से आगे निकल गया है ''इश्क़
दिल भी ख़ाली है अब पतीले सा
चाय के जैसे जल गया है ''इश्क़
सूरत-ए-हाल देखें क्या होगी
छोड़ कर मुझको कल गया है ''इश्क़
मैंने ढाला था 'इश्क़ में मिसरा
याँ तो मिसरे में ढल गया है ''इश्क़
आग का 'इश्क़ था कि काग़ज़ का
ये जो अश्कों से गल गया है ''इश्क़
हुस्न की कितनी ही दुकानों पर
तिफ़्ल जैसे मचल गया है ''इश्क़
फिर वही ना-नुकर रही उस की
फिर से इस बार टल गया है ''इश्क़
सैकड़ों लोग उन पे मरते हैं
उन को भी ख़ूब फल गया है ''इश्क़
हाए ये धूल क्यूँ उदासी की
मेरे चेहरे पे मल गया है ''इश्क़
एक औलाद की तरह साहिल
दस्तरस से निकल गया है 'इश्क़
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