करवट बदल बदल के बुलाई तमाम शब
वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब
तुम ने मुझे तो छोड़ दिया एक दफ़्अ में
करता रहा मैं रस्म-ए-विदाई तमाम शब
वो डॉक्टर मुझे दवा देकर बरी हुआ
खानी पड़ी थी मुझ को दवाई तमाम शब
उस्ताद ने कहा कि ग़ज़ल वो सुनाएँगे
हम ने तो फिर दरी ही बिछाई तमाम शब
हैरत मुझे है ये कि उसे शोर कब सुना
मैं ने तो ख़ामुशी ही सुनाई तमाम शब
जब से हवाएँ भी मेरे ख़ातिर नहीं चली
अपनी ही ख़ाक मैं ने उड़ाई तमाम शब
जबसे 'अधर' का एक भी चुंबन नहीं मिला
सिगरेट तभी से मैं ने जलाई तमाम शब
— Prabhat Adhar















