वो जिस दिलबर को जाना था निकल जाने दिया मैं ने

मकीं को एक मेहमाँ में बदल जाने दिया मैं ने

उसे मैं जानता था ढील से जाने नहीं वाला
जकड़ कर रेत मुट्ठी से फिसल जाने दिया मैं ने

यहाँ तो धूप है इतनी मैं करता भी तो क्या करता
ज़मीं की प्यास थी सागर निगल जाने दिया मैं ने

लगा बीमार की हालत बदलने ही नहीं वाली
किया फिर यूँ कि मौसम ही बदल जाने दिया मैं ने

बसें स्कूल के बच्चों का बचपन छीन लेती है
नहीं भेजा उसे पैदल निकल जाने दिया मैं ने

मुझे बचपन की बैसाखी नहीं बनना था बच्चे की
उसे गिरकर मियाँ ख़ुद ही सँभल जाने दिया मैं ने

'अधर' पर आग थी इतनी ग़ज़ल कहता तो क्या कहता
हलक़ में आ गया जो हर्फ़ जल जाने दिया मैं ने

— Prabhat Adhar

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