ये रौशनी के साथ में थोड़ी धुआँ रहे
मुझ
में कहीं अना रहे जब तक ज़बाँ रहे
हम पर वो थूक थूक के चेहरा भिगा लिए
सबके लिए तो आज भी हम आसमाँ रहे
बस इक ग़ज़ल सुना सुना बूढ़े हुए हैं हम
कोई ग़ज़ल रहे भी तो कब तक जवाँ रहे
आशिक़ जो बन सको तो तुझे प्यार भी मिले
मस्जिद तभी जवाँ रहे जब तक अज़ाँ रहे
मेरी ग़ज़ल समझती है मेरी बिरादरी
मेरी दुकाँ के वास्ते तेरी दुकाँ रहे
— Prabhat Adhar















