अब ख़ुशियों की फुलवारी में डर लगता है
अब हल्की सी बेज़ारी में डर लगता है
इल्म तो है की लाज़िम है साँसों को ढोना
लेकिन इस की तैयारी में डर लगता है
अब्र लूटकर ले जाते दरिया का पानी
साहब हम को दिलदारी में डर लगता है
धूप देख कर क्यूँ ख़ुश हो जाते हैं कपड़े
शायद उन को अलमारी में डर लगता है
हम भी दिन अब काग़ज़ में काटा करते है
हम को भी दुनिया दारी में डर लगता है
— John 'Adeeb'















