जो बात शर्त-ए-विसाल ठहरी वही है अब वज्ह-ए-बद-गुमानी

इधर है इस बात पर ख़मोशी उधर है पहली से बे-ज़बानी

किसी सितारे से क्या शिकायत कि रात सब कुछ बुझा हुआ था
फ़सुर्दगी लिख रही थी दिल पर शिकस्तगी की नई कहानी

अजीब आशोब-वज़्अ'-दारी हमारे आ'साब पर है तारी
लबों पे तरतीब-ए-ख़ुश-कलामी दिलों में तंज़ीम-ए-नौहा-ख़्वानी

हमारे लहजे में ये तवाज़ुन बड़ी सऊबत के बा'द आया
कई मिज़ाजों के दश्त देखे कई रवय्यों की ख़ाक छानी

— Azm Bahzad

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