जाने कितने बा'द सालों आज मैं घर आया हूँ
तेरी तन्हाई से घबरा कर में डर कर आया हूँ
सारे गुलशन में मुझे जो फूल प्यारा लगता था
मैं कमल के फूल से अब चोट खाकर आया हूँ
रातें कितनी बीत जाया करती थी तन्हा 'शुभम'
अब मैं उस की यादों को गंगा बहा कर आया हूँ
— Shubham Upwan














