ye kaisi khala jis | ये कैसी ख़ला जिस

  - Dharmesh bashar

ये कैसी ख़ला जिस
में फ़लक है न ज़मीं है
फिर भी है मुझे वहम कि कोई तो कहीं है

आलम ये सफ़र का है शब-ए-हिज्र की सूरत
मायूस ये दिल में भी निहाँ कुछ तो यक़ीं है

रफ़्तार की रंगत का कहें क्या ये जहाँ को
उड़ने को फ़लक ही है न चलने को ज़मीं है

किस किस पे भरोसा हो करूँँ किस सेे शिकायत
अपना जिसे कहता हूँ वही अपना नहीं है

कमज़ोर न कर दे कोई इन दोनों के रिश्ते
है मेरा सफ़ीना जहाँ तूफ़ाँ भी वहीं है

ऐ बर्क़ फ़क़त तुम सेे नहीं ख़ौफ़-ज़दा मैं
सय्याद भी गुलशन में छिपा बैठा कहीं है

मुश्ताक़ है खिलने को हर इक ग़ुंचा के जैसे
बेताब नुमाइश के सबब पर्दा-नशीं है

जुगनू ही सही ख़ौफ़ अँधेरों का मुझे कब
जुर्रत किसी सूरज से 'बशर' कम तो नहीं है

  - Dharmesh bashar

Wahshat Shayari

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