लोग तब तलक साथ चलते हैं
जब तक उन के मतलब निकलते हैं
बिक चुका है ईमान लोगों का
दिल हर एक शय पर फिसलते हैं
आज कल के लोगों को क्या पता
रिश्ते किस तरह से सँभलते हैं
हो भी सकती हैं मंज़िलें अलग
चल अभी तो हम साथ चलते हैं
उम्र जैसे जैसे बदलती है
शौक़ उस तरह ही बदलते हैं
ग़म भी अच्छे लगते हैं सुनने में
शा'इरी में ग़म जब भी ढलते हैं
— Karan Bedi















