सूना पड़ा है आँगन हमारा
टूटा है जब से बंधन हमारा
अपना नहीं है कोई यहाँ पर
आईना भी है दुश्मन हमारा
वो भी दिया आख़िर बुझ गया है
जिस से था ये घर रौशन हमारा
अब खा रहा है दफ़्तर जवानी
दुख खा चुके हैं बचपन हमारा
लगता है जिन को आसाँ वो कुछ दिन
जीकर बताओ जीवन हमारा
— Karan Bedi















