पराए शहर में अपना तलाश करते हैं
हम आ के दश्त में दरिया तलाश करते हैं
हमें नहीं है ज़रूरत तिरी मगर फिर भी
हर एक शख़्स में तुझ सा तलाश करते हैं
कुल्हाड़ी पैर पे अपने ही मार लेते हैं
शजर को काट के साया तलाश करते हैं
पुराना हो गया है ज़ख़्म बे-वफ़ाई का
सो कोई ज़ख़्म नया सा तलाश करते हैं
यहीं समंदरों के बीच खो गया है कहीं
क़दीम एक जज़ीरा तलाश करते हैं
— Karan Bedi















