उस के बदल जाने पे हैराँ तो नहीं
तुम उस की बातों से परेशाँ तो नहीं
बस हाथ को आगे करें और सब मिले
ऐ यार सब कुछ इतना आसाँ तो नहीं
हर बात पे हामी भरे जाता है जो
देखो कहीं वो शख़्स बे-जाँ तो नहीं
जिस को फ़रिश्ता मान बैठे हैं सभी
डर है मुझे वो महज़ इन्साँ तो नहीं
कुछ और भी तो होगा 'फ़लक' इस का सबब
ये ज़ीस्त अपनी सिर्फ़ ज़िन्दाँ तो नहीं
— Dr Saniya Tasnim














