देखना क्या था मगर क्या देखता हूँ
ख़्वाब में बस इक ही चेहरा देखता हूँ
मैं ने भी इक शख़्स को माना था दुनिया
अब बिना उस के ही दुनिया देखता हूँ
मुझ सा ही दिखता है वो ये तो ग़ज़ब है
आइने में जिस को तन्हा देखता हूँ
होता कामिल मैं तो ख़ुद को देख लेता
पर मैं सहरा हूँ तो दरिया देखता हूँ
पहले मुझ को कुछ ख़बर होती नहीं थी
अब अँधेरे में भी साया देखता हूँ
या'नी ये सच है कि तू मेरा नहीं है
या'नी मैं मैं या'नी सपना देखता हूँ
आप कहते हो 'भुवन' सब भूल जाओ
आप कहते हैं तो अच्छा देखता हूँ
— Bhuwan Singh















