ये जो आए हैं हैं सखी के बा'द
और सखी आई है सभी के बा'द
तुम सभी फूल ख़ूब-सूरत हो
हाँ मगर मेरी उस कली के बा'द
अब सभी के ज़बाँ पे है मिरा नाम
मैं जो आता था आख़िरी के बा'द
सब समझता हूँ आदतें तेरी
तू जो आता है तीरगी के बा'द
तेरे ही संग मुझ को जीना है
पर मिरी जान नौकरी के बा'द
मैं बहुत चाहता हूँ तुझ को दोस्त
बस ये इक मेरी शा'इरी के बा'द
क्या बताऊँ कि हूँ मैं कितना उदास
दोस्त वो तेरी बे-रुख़ी के बा'द
घर में अब कोई ग़म नहीं किसी को
दोस्त बस मेरी ख़ुद-कुशी के बा'द
— Brajnabh Pandey















