ज़िंदगी ऐसे हमें जीना पड़े है
मौत जिस
में एक तोहफ़ा सा लगे है
और रहा जाता नहीं हम से यहाँ पर
और यहीं पर जाँ हमारे पा गड़े है
हाथ जोड़े है तू जिस के सामने जाँ
वो भरी महफ़िल हमारे पा पड़े है
है वो सारे शहर में बदनाम फिर भी
जान तू उस को भरी महफिल छुए है
मैं तो मुझ को ब्रज बहुत ख़ुश ही लगू हूँ
तुझ को क्यूँ मुझ में उदासी सी लगे है
— Brajnabh Pandey















