सब लोग कहानी में ही मशरूफ़ रहे थे

दरअस्ल अदाकार हक़ीक़त में मरे थे

जाते हुए कमरे की किसी चीज़ को छू दे
मैं याद करूँगा कि तेरे हाथ लगे थे

आँखें भी तेरी फतह न कर पाए अभी तक
किस लम्हा ए बेकार में हम लोग बने थे

मैं ने तो कहा था निकल जाते है दोनों
उस वक़्त कहानी में सभी लोग नए थे

— Danish Naqvi

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