bahut main himmat bhi karke shaayad sabhi ko darpan dikha raha hooñ | बहुत मैं हिम्मत भी करके शायद सभी को दर्पण दिखा रहा हूँ

  - Danish Balliavi

बहुत मैं हिम्मत भी करके शायद सभी को दर्पण दिखा रहा हूँ
मरा पड़ा है यहाँ का मुंसिफ़ यही तो मैं सच बता रहा हूँ

ज़रा बग़ावत करो सियासत कि तुम सज़ा दो यूँँ मुज़रिमों को
मैं बेगुनाहों के सिर्फ़ अब तो यहाँ जनाज़े उठा रहा हूँ

मैं ज़ुल्म को रोकने की ख़ातिर क़लम का लेता हूँ बस सहारा
जो लोग हैं इल्म वाले मुर्शद उन्हीं को अब मैं जगा रहा हूँ

बहुत ज़रूरी है अब यहाँ पर सभी से मिल्लत सभी से चाहत
जो नफ़रतों में ही पल रहे हैं उन्हें मुहब्बत सिखा रहा हूँ

जो ख़ार हैं नफ़रतों के 'दानिश' उन्हें हराना है फूलों से अब
जो है फ़िदा चाय शर्बतों पर मैं उनको ज़म-ज़म पिला रहा हूँ

  - Danish Balliavi

Gunaah Shayari

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