ज़िंदगी की शमा' जब जलाई गई
दर्द की संग में रौशनाई गई
अश्क आँखें मुसलसल बहाती रहीं
पे मुसलसल ही ग़ज़लें सुनाई गई
याद तेरी रही साथ मेरे मगर
याद भी साथ क्या वो भी आई गई
ज़ेहन को थी ख़बर वो नहीं है यहाँ
और दिल को तसल्ली दिलाई गई
ले के तेरा गिला दोस्तों से मिला
हस्ब-ए-दस्तूर मय भी पिलाई गई
— Dhiraj Singh 'Tahammul'















