वक़्त का था तक़ाज़ा बदलता रहा
कोई बाहों में आ के फिसलता रहा
सोचते थे परिंदा वो महफ़ूज़ है
क़ैद खाती रही वो मचलता रहा
एक पल में छुड़ा हाथ रुख़्सत हुआ
मैं खड़ा देर तक हाथ मलता रहा
यूँँ नहीं आ गया नूर ये शाम का
डूबता था कि सूरज वो जलता रहा
कौन थे लोग जिनको मिली मंज़िलें
'उम्र भर ही तहम्मुल टहलता रहा
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