वक़्त का था तक़ाज़ा बदलता रहा
कोई बाहों में आ के फिसलता रहा
सोचते थे परिंदा वो महफ़ूज़ है
क़ैद खाती रही वो मचलता रहा
एक पल में छुड़ा हाथ रुख़्सत हुआ
मैं खड़ा देर तक हाथ मलता रहा
यूँ नहीं आ गया नूर ये शाम का
डूबता था कि सूरज वो जलता रहा
कौन थे लोग जिन को मिली मंज़िलें
उम्र भर ही तहम्मुल टहलता रहा
— Dhiraj Singh 'Tahammul'















