मुझे है इश्क़ जिस सेे इक सदी से
उसे भी इश्क़ है पर और किसी से
नज़र आती नहीं मुझ को कहीं पर
लिपट जाता वगरना मैं ख़ुशी से
मुझे है इल्म मेरी ज़िन्दगी ही
जुदा कर देगी मुझ को ज़िन्दगी से
कमी कोई नहीं मुझ को तो यूँंँ पर
मुझे है हर कमी बस इक कमी से
कभी रोते नहीं हम ग़म में अपने
कभी हंँसते नहीं हम गुदगुदी से
कि अब के दरमियाँ झगड़े न लाओ
जुदा हो जाओ अब के ख़ामोशी से
मुझे डर है कोई पूछे न मुझ को
तुम्हें भी है मोहब्बत क्या किसी से
बिछड़ते वक़्त उस से ये दुआ की
कभी कोई न यूँंँ बिछड़े किसी से
— Dipendra Singh 'Raaz'















