ख़ाक कर के आशियाना ले गए
हम ग़रीबों की वो दुनिया ले गए
पहले वा'दा पेट भरने का किया
और फिर मुँह से निवाला ले गए
देखता ही रह गया मैं और वो
लूट कर घर - बार मेरा ले गए
वो जो लड़ते थे ज़मीं के वास्ते
जब वो दुनिया से गए क्या ले गए
रौशनी की खोज में ये चंद लोग
आसमाँ से एक तारा ले गए
वो किताबें ले गए मेरी मगर
यूँ लगा मेरा सहारा ले गए
— Divyansh Rawat














