हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले

न थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले

है ये मेरी बद-नसीबी तेरा क्या क़ुसूर इस में
तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िंदगी से पहले

मेरा प्यार जल रहा अरे चाँद आज छुप जा
कभी प्यार था हमें भी तेरी चाँदनी से पहले

मैं कभी न मुस्कुराता जो मुझे ये इल्म होता
कि हज़ार ग़म मिलेंगे मुझे इक ख़ुशी से पहले

ये अजीब इम्तिहाँ है कि तुम्हीं को भूलना है
मिले कब थे इस तरह हम तुम्हें बे-दिली से पहले

— Fayyaz Hashmi

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