आँखों को उस के अलावा और कुछ दिखता नहीं है

इस से ज़ाहिर है मोहब्बत का नशा उतरा नहीं है

एक वो भी दौर था जब हक़ जमाता था मैं उस पर
और अब ये हाल है वो शख़्स ही अपना नहीं है

ऐन मुमकिन है कि वो दुख जान ही ले ले सो मैं ने
एहतियातन ख़त वो उस का आख़िरी खोला नहीं है

तुम कभी मुझ को कलेजे से लगाकर आज़माना
झूठ कहती है ये दुनिया आदमी रोता नहीं है

शे'र पर सीटी बजाकर दाद देने वालों सुन लो
एक महफ़िल है अदब की ये कोई मुजरा नहीं है

शा'इरी के साथ जिस का वस्ल हो जाता है उस को
हिज्र के भी दौर में फिर जान का ख़तरा नहीं है

— Harsh saxena

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