ये सिंदूर मेंहदी नथ महावर मुबारक हो

सितमगर तुझे अपना नया घर मुबारक हो

जो ब्याही हो अफ़सर से तो इस
में नया क्या है
मगर जिस का शौहर हो सुख़न-वर मुबारक हो

मैं वो हूँ कि जो तरसा है इक बूँद की ख़ातिर
मुयस्सर हुआ जिस को समुंदर मुबारक हो

इसी ख़्वाब में ज़ाया' किया ईद को हर दम
कभी बोले वो सीने से लग कर मुबारक हो

बिछड़ जाएँ उस पर ये कि हँसकर बिछड़ जाएँ
कहाँ मिलता है ऐसा मुक़द्दर मुबारक हो

तिरे फ़न को जो भी 'हर्ष' कमतर समझते थे
वही कह रहे हैं अब मुकर्रर मुबारक हो

— Harsh saxena

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