मेरे ये ख़्वाब हाए! बड़े ही सियाने हैं
आँखों में इनको ख़्वाब तुम्हारे सजाने हैं
अब तक बचा रखे हैं ज़माने की नज़रों से
कुछ शे'र हैं जो सिर्फ़ तुम्हें ही सुनाने हैं
बर्बाद कर चुके हैं मोहब्बत में ख़ुद को हम
अब हाथ शे'र-ओ-शाइ'री में आज़माने हैं
हमनें सँभाल रक्खे हैं अपनी तिज़ोरी में
उस के दिए वो तोहफ़े नहीं हैं ख़ज़ाने हैं
हाँ एक दौर था कि अमानत थे उस की हम
अब क्या बताएँ क़िस्से ये बेहद पुराने हैं
— Harsh saxena















