इक वीराने के बिस्मिल थे हम

पर तब भी कितने ख़ुश-दिल थे हम

फिर एक रोज़ आँसू निकल पड़े
फिर एक रोज़ तक कामिल थे हम

डूब गए हम तक आने वाले
ऐसे दरिया के साहिल थे हम

ख़ुद को उर्यां कर के देखा जब
जाना ख़ुद अपने हाइल थे हम

वो तो दुनिया चाट गई हम को
वरना ख़ुद ही इक महफ़िल थे हम

जिन को चाहा जिन से इश्क़ किया
उन सब की पहली मंज़िल थे हम

ये आँखें शीशा तकती हैं और
रो कर कहती हैं क़ाबिल थे हम

नहीं निभाया साथ किसी ने भी
हाँ लेकिन सब को हासिल थे हम

समझौते बढ़ते ही रहे वरना
बच्चों के जैसे ख़ुश-दिल थे हम

याद किया था हम ही ने उस को
'हर्षित' ख़ुद अपने क़ातिल थे हम

— harshit karnatak

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