harshit karnatak

harshit karnatak

@harshit1234k

harshit karnatak shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in harshit karnatak's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मर कर ही अब उस के दिल में उतरा जा सकता है तीर नुकीला न हो तो कितना गहरा जा सकता है — harshit karnatak
हाल ऐसा के बता भी कुछ नहीं सकता किसी को लोग ऐसे की गले से भी नहीं मुझ को लगाते — harshit karnatak
तू ने यार कभी भी खिलता फूल नहीं देखा तू जब उस को देखेगा तो कैसे देखेगा — harshit karnatak
बेताबी-ए-दिल के वास्ते कोई मरासिम तो रख जाते-जाते कुछ तो कह दे कोई मरासिम तो रख — harshit karnatak
चाहत थी आबाद रहे पर मर जाए भी चाहा मेरी कैसी मजबूरी है कैसा पागलपन है — harshit karnatak

Ghazal

वीरानी में फूल खिलाना उस का पागलपन है लेकिन कुछ भी कहो ये बेहद प्यारा पागलपन है अपने काम भुला कर के उस की हाँ में हाँ भरना मेरे दिल के सदके में बस अंधा पागलपन है दरिया का सूखा पड़ जाना फूलों का मुरझाना सब हैरानी है पर तेरा जाना पागलपन है हर दिन दिन में एक दफ़ा बस उस को देखने की लत मैं क्या करूँँ अगर मेरा हम साया पागलपन है क्या मैं क्यूँँ अपने सहरा की जानिब निकल रहा हूँ शायद मैं प्यासा हूँ शायद प्यासा पागलपन है है जीत कर खुला मुझ पर ये दुनिया के बारे में खेल नहीं है ये दुनिया ये दुनिया पागलपन है चाहत थी आबाद रहे पर मर जाए भी चाहा मेरी कैसी मजबूरी है कैसा पागलपन है इन आँखों के काले घेरों का कुछ सबब तो होगा ख़्वाब नहीं नींद भी नहीं तो है क्या पागलपन है ये पागलपन तेरी माँगी हुई दुआ है 'हर्षित' आड़ा सीधा जैसा भी है तेरा पागलपन है — harshit karnatak
इक वीराने के बिस्मिल थे हम पर तब भी कितने ख़ुश-दिल थे हम फिर एक रोज़ आँसू निकल पड़े फिर एक रोज़ तक कामिल थे हम डूब गए हम तक आने वाले ऐसे दरिया के साहिल थे हम ख़ुद को उर्यां कर के देखा जब जाना ख़ुद अपने हाइल थे हम वो तो दुनिया चाट गई हम को वरना ख़ुद ही इक महफ़िल थे हम जिन को चाहा जिन से इश्क़ किया उन सब की पहली मंज़िल थे हम ये आँखें शीशा तकती हैं और रो कर कहती हैं क़ाबिल थे हम नहीं निभाया साथ किसी ने भी हाँ लेकिन सब को हासिल थे हम समझौते बढ़ते ही रहे वरना बच्चों के जैसे ख़ुश-दिल थे हम याद किया था हम ही ने उस को 'हर्षित' ख़ुद अपने क़ातिल थे हम — harshit karnatak
उस के मन के भीतर क्या क्या नहीं हुआ वो फूल जो किसी तितली का नहीं हुआ इश्क़ में बँटता नहीं बराबर से कुछ भी मैं ज़ाया' हो गया वो तन्हा नहीं हुआ उस ने तो तीसरी मोहब्बत भी कर ली मुझ सेे घर के बाहर जाना नहीं हुआ टूट गया था अंदर तक पर कुछ न कहा वो ख़ुश थी बात का तमाशा नहीं हुआ मेरा नाम बदल कर बला रखा जाए मेरे साथ किसी का अच्छा नहीं हुआ मली गई थी कालिख कुछ इस तरह कि फिर अंदर तक में कभी उजाला नहीं हुआ इत्र लगा कर आई थी ख़ुद-कुशी मगर मैं उस ख़ुशबू का दीवाना नहीं हुआ मेरे गिरने पर हँसने वाले लोगों मेरे मरने पर कुछ हूँ हा नहीं हुआ — harshit karnatak
खुल कर रो न सकेगा जो मरना उस का मुमकिन है ख़ैर करो तुम रो सकते हो तो हँसना मुमकिन है जिन लोगों के पैरों को छालों ने निगल लिया है ख़ुश-फ़हमी में थे कि ख़ुदा का तो होना मुमकिन है हम जैसे लोग अब कहाँ जाएँ क्या करें कला का कि ख़ुद-फ़रेबी कर के भी आब-ओ-दाना मुमकिन है बीच सफ़र में अटका मैं जब आया मुझे समझ तब कि हम सेफ़र हो अगर तो हर एक रास्ता मुमकिन है कुछ इस तरह निभाया मैं ने अपना इक तरफ़ा इश्क़ उस ने माँगा जो कुछ भी मैं ने बोला मुमकिन है मेरी बातों के ऊपर से चल कर गुज़र गया वो मैं चीख़ता रहा ओ ओ बे-वफ़ा वफ़ा मुमकिन है 'हर्षित' मैं अब भी इस के मलबे में दबा हुआ हूँ तू तो कहता था रश्क़ से निकल पाना मुमकिन है — harshit karnatak
इक अजब सी पारसाई आँख में है बे-वफ़ा है पर वफ़ाई आँख में है मिलते थे तो रहते थे जन्नत में दोनों बिछड़े हैं तो भी ख़ुदाई आँख में है उस के ग़म का एक टुकड़ा बह चुका है और बाकी दो तिहाई आँख में है मैं यक़ीं कैसे करूँँ तुझ पर कि अब भी इंतिहा-ए-बेवफ़ाई आँख में है मुझ को आता ही नहीं बातें छिपाना राज़ भी मेरा पराई आँख में है कैनवस का रंग फीका हो चुका अब आख़िरी ही लब-कुशाई आँख में है ठीक था दुनिया से जब तक अजनबी थे अब तो इस की बद-नुमाई आँख में है कोई तो लेता छिपा अपना समझ कर क्यूँँ सभी की बे-अदाई आँख में है क्या ये ख़त्त-ओ-ख़ाल मेरी चाह से थे क्या करूँँ गर कर्बलाई आँख में है ज़ोर है आवाज़ में जो इस लिए है हादिसे की पा बजाई आँख में है बाँटते हैं हर किसी को देख कर बस नफ़रतों की रौशनाई आँख में है अब तो 'हर्षित' तू उसे आवाज़ दे दे कुछ पलों की आशनाई आँख में है — harshit karnatak
हुआ ये, मुझे है से था कर दिया है ख़ुदा ने मेरा हाल क्या कर दिया है वफ़ा की ख़ता पर ख़फ़ा बे-वफ़ा है इसी बात ने मुब्तला कर दिया है कहीं भी नहीं था अना में जो है अब किसे माँग कर जा-ब-जा कर दिया है सफ़र वापसी का अकेले किया जब समझ आ रहा था कि क्या कर दिया है ख़ुदा ने मेरे क्यूँ मुझे कोई अच्छी न सूरत न ढाँचा बना कर दिया है रखा सब्र मैं ने तो समझा कि मुझ को ग़ज़ल का हुनर क्यूँ अता कर दिया है मेरे सिर बला थी जिसे माँ ने सिर पर फ़क़त हाथ रख कर दफ़ा कर दिया है लगा था मुझे बात आगे बढ़ेगी मगर उस ने मुझ को मना कर दिया है बता देखते अब भला किस को? उस को चला जो गया है गया कर दिया है — harshit karnatak

Nazm

"ग्लानि" मेरे कमरे में इक खिड़की है इक दरवाज़ा है खिड़की बिन जाली की दरवाज़ा बिन कुंडे का है इक पिंजरा खिड़की के पास रखा है जिस में एक परिंदा है जो मायूस होकर बैठा है मानो मरने का मन उस का है मगर हक़ीक़त है बस इतनी मन उस का उड़ने का है उस का पिंजरे में होने का कारण मेरी अना है मुझे पता है कोने में कुछ फूल रखे हैं जो बिल्कुल पीले हो चुके हैं जिन का रस तक सूख गया है रंग भी जिन का उतरा उतरा है कमरे में शीशा भी है हर पल मुझ पर हँसता था मैं ने उस को तोड़ दिया है मैं बिस्तर पर पसर रखा हूँ उस के टुकड़े पड़े हुए हैं इक कोने में दीवारें भी मुझ को घूर रहीं हैं मेरे बगल में चाय रखी है जिस की पपड़ी पर बैठी मक्खी है कुछ भी ठीक नहीं सो मैं अब उस को ख़्वाबों में देखने लगा हूँ हम दोनों बाग़ों में दौड़ रहे हैं फूल खिले हैं सरसों के उस की बाईं और और परिंदे हैं जो चहक रहे हैं उस की दाईं और कुछ तो उड़ रहे हैं कुछ दौड़ रहे हैं हम दोनों भी थक कर बैठ गए हैं उस ने चाय चढ़ा भी दी है मैं बस बातें बना रहा हूँ उस के चारों ओर जो गमले हैं उन में फूल लगाकर वो ख़ुद को और हसीन किए जाने में लगी है लेकिन सपना टूटते देर कहाँ लगती है सो मेरा सपना भी टूट गया फूल परिंदों तक ठीक था मगर चाय थोड़ी ज़्यादा मीठी निकली उस सेे भी ज़्यादा आँखें खोली हैरत में जब देखा सूखे फूल इशारा कर रहे थे खिड़की की जानिब पड़ा हुआ था पिंजरे में मर कर वो मायूस परिंदा शीशे के टुकड़े जो हँस रहे थे अब भी मुझ पर और वो मक्खी मानो ख़ुश हो मुझे यूँँ देख कर रोते-रोते दीवारों की सब पपड़ियाँ सभी रंग छँट चुके थे चौखटों के मुँह फूल चुके थे इस मुद्दे पर इतनी ग़ैरत हुई मुझे कि मैं ने शीशे के कुछ टुकड़े हाथ में ले कर भर दी दीवार और फिर फर्श तब भी चैन नहीं मिल पाया तो फिर रख कर सूखे फूल बदन पर मैं रो रहा था उस को सब रो रहे थे मुझ पर बदल नहीं सकता मैं अब कुछ पर मैं ख़ुद को बदल रहा हूँ सॉरी बोल रहा हूँ मैं पिंजरा खोल रहा हूँ मैं — harshit karnatak