एक तो सब हम सेे बरहम हैं ऊपर से फिर ग़म ही ग़म हैंकिस पर चीखें चिल्लाएँ हमअब तो केवल हम ही हम हैंओ क़हक़हा लगाने वालोंदर्द ठहाकों के हर दम हैंबाहर इक दो जाम बचे हैंअंदर अब भी सौ सौ ग़म हैंनक़ली फूलों पर भी देखोजमी हुई ढेरों शबनम हैं— harshit karnatak