"ग्लानि"
मेरे कमरे में इक खिड़की है इक दरवाज़ा है
खिड़की बिन जाली की दरवाज़ा बिन कुंडे का है
इक पिंजरा खिड़की के पास रखा है
जिस
में एक परिंदा है
जो मायूस होकर बैठा है
मानो मरने का मन उस का है
मगर हक़ीक़त है बस इतनी
मन उस का उड़ने का है
उस का पिंजरे में होने का कारण
मेरी अना है मुझे पता है
कोने में कुछ फूल रखे हैं
जो बिल्कुल पीले हो चुके हैं
जिन का रस तक सूख गया है
रंग भी जिन का उतरा उतरा है
कमरे में शीशा भी है
हर पल मुझ पर हँसता था
मैं ने उस को तोड़ दिया है
मैं बिस्तर पर पसर रखा हूँ
उस के टुकड़े पड़े हुए हैं इक कोने में
दीवारें भी मुझ को घूर रहीं हैं
मेरे बगल में चाय रखी है
जिस की पपड़ी पर बैठी मक्खी है
कुछ भी ठीक नहीं सो मैं अब
उस को ख़्वाबों में देखने लगा हूँ
हम दोनों बाग़ों में दौड़ रहे हैं
फूल खिले हैं सरसों के उस की बाईं और
और परिंदे हैं जो चहक रहे हैं उस की दाईं और
कुछ तो उड़ रहे हैं कुछ दौड़ रहे हैं
हम दोनों भी थक कर बैठ गए हैं
उस ने चाय चढ़ा भी दी है
मैं बस बातें बना रहा हूँ
उस के चारों ओर जो गमले हैं
उन
में फूल लगाकर वो ख़ुद को
और हसीन किए जाने में लगी है
लेकिन सपना टूटते देर कहाँ लगती है
सो मेरा सपना भी टूट गया
फूल परिंदों तक ठीक था मगर
चाय थोड़ी ज़्यादा मीठी निकली
उस से भी ज़्यादा
आँखें खोली हैरत में जब देखा
सूखे फूल इशारा कर रहे थे खिड़की की जानिब
पड़ा हुआ था पिंजरे में मर कर वो मायूस परिंदा
शीशे के टुकड़े जो हँस रहे थे अब भी मुझ पर
और वो मक्खी मानो ख़ुश हो मुझे यूँ देख कर
रोते-रोते
दीवारों की सब पपड़ियाँ सभी रंग छँट चुके थे
चौखटों के मुँह फूल चुके थे इस मुद्दे पर
इतनी ग़ैरत हुई मुझे कि मैं ने
शीशे के कुछ टुकड़े हाथ में ले कर
भर दी दीवार और फिर फर्श
तब भी चैन नहीं मिल पाया तो फिर
रख कर सूखे फूल बदन पर
मैं रो रहा था उस को
सब रो रहे थे मुझ पर
बदल नहीं सकता मैं अब कुछ
पर मैं ख़ुद को बदल रहा हूँ
सॉरी बोल रहा हूँ मैं
पिंजरा खोल रहा हूँ मैं















