जब हमनशीं हर्फ़-ए-वफ़ा को खा गई
अक्स-ए-क़मर बाद-ए-सबा को खा गई
बढ़ती रही दिल में मेरे फिर एक दिन
वहशत मेरी कार-ए-वफ़ा को खा गई
दिन घटते थे बढ़ते ज़ियाँ के साथ साथ
ये ज़िन्दगी मन की क़ज़ा को खा गई
सर जो झुका हाथों को वापिस ले लिया
मेरी अना मेरी दुआ को खा गई
चलते रहा मैं ज़िन्दगी के नक़्श पर
ये बंदगी हर इल्तिजा को खा गई
— harshit karnatak














