इक अजब सी पारसाई आँख में है
बे-वफ़ा है पर वफ़ाई आँख में है
मिलते थे तो रहते थे जन्नत में दोनों
बिछड़े हैं तो भी ख़ुदाई आँख में है
उस के ग़म का एक टुकड़ा बह चुका है
और बाकी दो तिहाई आँख में है
मैं यक़ीं कैसे करूँ तुझ पर कि अब भी
इंतिहा-ए-बेवफ़ाई आँख में है
मुझ को आता ही नहीं बातें छिपाना
राज़ भी मेरा पराई आँख में है
कैनवस का रंग फीका हो चुका अब
आख़िरी ही लब-कुशाई आँख में है
ठीक था दुनिया से जब तक अजनबी थे
अब तो इस की बद-नुमाई आँख में है
कोई तो लेता छिपा अपना समझ कर
क्यूँ सभी की बे-अदाई आँख में है
क्या ये ख़त्त-ओ-ख़ाल मेरी चाह से थे
क्या करूँ गर कर्बलाई आँख में है
ज़ोर है आवाज़ में जो इस लिए है
हादिसे की पा बजाई आँख में है
बाँटते हैं हर किसी को देख कर बस
नफ़रतों की रौशनाई आँख में है
अब तो 'हर्षित' तू उसे आवाज़ दे दे
कुछ पलों की आशनाई आँख में है















