खुल कर रो न सकेगा जो मरना उस का मुमकिन है

ख़ैर करो तुम रो सकते हो तो हँसना मुमकिन है

जिन लोगों के पैरों को छालों ने निगल लिया है
ख़ुश-फ़हमी में थे कि ख़ुदा का तो होना मुमकिन है

हम जैसे लोग अब कहाँ जाएँ क्या करें कला का
कि ख़ुद-फ़रेबी कर के भी आब-ओ-दाना मुमकिन है

बीच सफ़र में अटका मैं जब आया मुझे समझ तब
कि हम सेफ़र हो अगर तो हर एक रास्ता मुमकिन है

कुछ इस तरह निभाया मैं ने अपना इक तरफ़ा इश्क़
उस ने माँगा जो कुछ भी मैं ने बोला मुमकिन है

मेरी बातों के ऊपर से चल कर गुज़र गया वो
मैं चीख़ता रहा ओ ओ बे-वफ़ा वफ़ा मुमकिन है

'हर्षित' मैं अब भी इस के मलबे में दबा हुआ हूँ
तू तो कहता था रश्क़ से निकल पाना मुमकिन है

— harshit karnatak

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