बचाओ-बचाओ वो चिल्ला रही थी
बिछड़ कर जो मुझ से, मरे जा रही थी
ग़ज़ल गर मैं कहता वो बदनाम होती
क़लम से मेरी वो डरे जा रही थी
क़सम तोड़-के घर गई थी जो लड़की
वो शादी में अपने क़सम खा रही थी
मुझे जब दवा की ज़रूरत थी यारों
नमक दे के मुझ को वो तड़पा रही थी
— Harshwardhan Aurangabadi















