बे-हया बे-वफ़ा बे-मुरव्वत सनम
अब नहीं है तू मेरी मुहब्बत सनम
इक दफ़ा देख ले आइना और फिर
भेज ले ख़ुद ही तू ख़ुद को लानत सनम
बे-रुख़ी मैं तिरी हँस के सहता था पर
अब नहीं रह गई मुझ में हिम्मत सनम
जिस्म में हो चमक और दिल हो सियाह
हो मुबारक तुझे ऐसी शोहरत सनम
तू दग़ा भी करे और ख़ुश भी रहे
इतनी अच्छी नहीं तेरी क़िस्मत सनम
आज भी दिल मिरा है तिरा इसलिए
मैं ने कर ली है दिल से अदावत सनम
नाम तक उस का फिर भूल जाता हूँ मैं
जिस से हो जाती है मुझ को नफ़रत सनम
जान-ए-'सागर' हैं तुझ में अदाएँ सभी
जो नहीं है वो है अच्छी सीरत सनम
— SAAGAR SINGH RAJPUT















