यार हम सेल्फ़ियाँ नहीं लेंगे
जब ग़रीबों को रोटियाँ देंगे
जब तलक वक़्त हम से रूठा है
सब के ताने ख़ुशी से सह लेंगे
जिस तरफ़ भी कहेगा चल ने को
अपने भाई के साथ चल देंगे
उन को कैसे जहाँ हराएगा
जो जहाँ से फ़रेब सीखेंगे
हम पे ढाए हैं क्यूँ सितम इतने
एक दिन ज़िंदगी से पूछेंगे
सर झुकाएँगे रब के आगे पर
अपने हालात ख़ुद ही बदलेंगे
उन को भगवान देख लेगा जो
खेल 'सागर' के साथ खेलेंगे
— SAAGAR SINGH RAJPUT















