पुराने मोहल्ले का सुनसान आँगन

मुझे पा के था कितना हैरान आँगन

ये तहज़ीब को पाँव चलना सिखाएँ
समेटे हैं सदियों के इम्कान आँगन

वो दीवार से झाँकती शोख़ आँखें
वो पहरे पे बूढ़ा निगहबान आँगन

कोई जस्त में पार करता है चौखट
किसी के लिए इक बयाबान आँगन

किसी के लिए पाया-ए-तख़्त है ये
किसी के लिए एक ज़िंदान आँगन

सुना रफ़्ता रफ़्ता खंडर हो रहे हैं
वो आबाद गलियाँ वो गुंजान आँगन

किधर जाएँ तहज़ीब की हिजरतों में
ये बूढे दरख़्त और ये वीरान आँगन

— Ishrat Afreen

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