ज़माना साथ चला है तो साथ ग़म भी चले हयात-ओ-मौत के रिश्ता में एक और गिरहउफ़ुक़ के पास स्याही की सरहदों से दूरशफ़क़ की गोद में किरनों की साँस टूट गईथके थके से मुसाफ़िर उधार की पूँजीजो काएनात के विर्से की इक ख़यानत हैचले हैं ले के किसी शाहराह की जानिब— Javed Kamal Rampuri