रात ढलती है सुब्ह होती है
खोल दो अब तो उठ के दरवाज़ा
इस अँधेरी सी कोठरी में आज
वक़्त आया है रहने बसने को
ऐसे मेहमाँ का क्या भरोसा है
ये दबे पाँव लौट जाएगा
— Javed Kamal Rampuri
खोल दो अब तो उठ के दरवाज़ा
इस अँधेरी सी कोठरी में आज
वक़्त आया है रहने बसने को
ऐसे मेहमाँ का क्या भरोसा है
ये दबे पाँव लौट जाएगा
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