अंदेशा खो जाने का
उम्मीद कुछ पाने की
हुज़्न-ओ-मसर्रत
हमारे अपने इख़्तियार के
अंदेशा
दीमक है
जो
मसर्रत के दरख़्तों की जड़ों को चाटती रहती है
तुम
बे-अंदेशा क्यूँ नहीं हो जाते
कि पैदाइश से मौत तक ज़िंदगी के लम्हों को
तुम उन के मआल-ए-मुतअय्यना से हट कर नहीं जी सकते
— Javed Nadeem















