मेरे ग़म को भी जान पाते तुम
दिल न औरों से फिर लगाते तुम
देखते गर तुम आ के हाल मिरा
एक बार आते फिर न जाते तुम
बैठ कर काश सामने मेरे
मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाते तुम
कोई तो है वहाँ मिरे जैसा
यूँ मुझे फिर न भूल जाते तुम
कोई तो ग़म तुम्हें भी है वर्ना
बे-सबब यूँ न मुस्कुराते तुम
— 'June' Sahab Barelvi















