फ़ासले दिल के मिटाने में ज़माने लग गए

बे-वजह फिर मुस्कुराने में ज़माने लग गए

हाल जो देखा ज़माने में हक़ीक़त का बुरा
ख़्वाब आँखों को दिखाने में ज़माने लग गए

उम्र भर दीवानगी शोहरत-परस्ती के लिए
चार काँधे भी जुटाने में ज़माने लग गए

साहिब-ए-ग़ैरत को ज़िद पैसा कमाने की लगी
पैसा ग़ैरत से कमाने में ज़माने लग गए

क़तरे क़तरे में मज़ा लो जाम की ये कैफ़ियत
पीने वालों को सिखाने में ज़माने लग गए

था नहीं आसाँ मुकद्दर का सिकंदर बनना भी
इन लकीरों को बनाने में ज़माने लग गए
इश्क़ की बरसात में जो भीगते थे रात दिन
उन लिबासों को सुखाने में ज़माने लग गए

— Anand Sharma

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