किसी से पूछना तुम भी, ये आगाज़-ए-सफ़र मेरा
मेरे ही साथ में निकला था रो-रो कर के घर मेरा
सुनो इक ख़ौफ़ ने घबरा के फ़ौरन ख़ुद-कुशी कर ली
किसी ने कह दिया था देख ले इक बार डर मेरा
बड़े बेटे की मय्यत ने यूँ तोड़ा बाप का काँधा
किसी की याद में फिर गिर पड़ा आबाद घर मेरा
बग़ीचे की वो सारी तितलियाँ आवाज़ देती हैं
बुलाता है मुसलसल यार आँगन का शजर मेरा
— "Nadeem khan' Kaavish"















