न जाने कितनी आँखों से गुज़र के रेल गुज़री थी
बहुत थर्रा के यारों मेरे दिल से रेल गुज़री थी
उसे जब रेल में बैठाया तो रोने लगा था शहर
यक़ीं मानो बहुत मायूस हो के रेल गुज़री थी
कलेजा चीरकर मुफ़लिस का इस की राह निकली है
कलेजे के कलेजों से गुज़र के रेल गुज़री थी
बुलाता रह गया वो शख़्स अपनी मौत पर मुझ को
इसी इक हादसे से ठीक पहले रेल गुज़री थी
जहाॅं से रेल गुज़री थी वहीं पर तुझ को देखा था
मगर देखा भी तो ऐसे कि जैसे रेल गुज़री थी
— "Nadeem khan' Kaavish"















