मोहब्बतों के हर इक सम्त शादियाने थे
गुज़िश्तगा के ज़माने भी क्या ज़माने थे
सरों पे रात जो आई हमें ख़्याल आया
हमें चराग़ अभी और भी जलाने थे
मैं उस सेे उसका पता पूछ कर भी क्या करता
हवा के अपने भला कौन से ठिकाने थे
मैं इसलिए भी वहाँ नक्श-ए-पा बना आया
कि मेरे बाद कईं लोग आने जाने थे
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