मोहब्बतों के हर इक सम्त शादियाने थेगुज़िश्तगा के ज़माने भी क्या ज़माने थेसरों पे रात जो आई हमें ख़याल आयाहमें चराग़ अभी और भी जलाने थेमैं उस से उस का पता पूछ कर भी क्या करताहवा के अपने भला कौन से ठिकाने थेमैं इस लिए भी वहाँ नक्श-ए-पा बना आयाकि मेरे बा'द कईं लोग आने जाने थे— Khalid Sajjad