मैं ने बदलता शख़्स अक्सर देखा है
अपनों के हाथों में ही ख़ंजर देखा है
यूँ तो कई देखें बदलते लोगों को
तुम जिस तरह बदले हो कमतर देखा है
तुझ पे यक़ीं कैसे करूँ कल शब तुझे
मैं ने किसी के साथ बाहर देखा है
तुझ को बताऊँ और क्या क्या देखा है
लब उस के मैं ने तेरे लब पर देखा है
गुज़रा मिरा मिट्टी में बचपन और तुम
कहते हो मैं ने मिट्टी का घर देखा है
— Rovej sheikh















